कितनी अकेली कितनी तनहा सी लगी, उन से मिलके मै आज
इस तरह खुले नैना, आये वो मेरे आगे
जिस तरह किसी गहरी नींद से कोइ जागे
अब जहा से दूर हू कही, बैठी मै अलबेली
काश वो मेरे बन के पास यू कभी आते
खुलते पार बाहो के, तन दिए से जल जाते
प्यार के बिना है ये मन मेरा, जैसे सूनी हवेली
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