अपनी नज़रो से बहुत दूर छुपा दू खुद को
जी मे आता है की कही रख के भुला दू खुद को
ना अपना था जो कल गुज़ारा जो अब है वो है गैरो का
नही उम्मीद अब कोई कल हमारा भी क्या होगा..
बड़ी रानाईया होगी जहा मे हम नही होगे
हमारे एक ना होने से फ़साने कम नही होगे
हमारा आज चर्चा है तो कल औरो का फिर होगा
ना अपना था
उजाड़ने को है फिर महफ़िल नयी आबाद कर लेना
नयी बुनियाद जब रखो हमे भी याद कर लेना
दुखाना दिल को न हरगिज़ दुखाकर दिल को क्या होगा
ना अपना था
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