काली रात जैसा जीवन
सवेरा होगा क्या कभी
राहे ऐसी चुनी मैने शायद मुमकिन नही कुछ ऐसे
कुछ ऐसी बेरहमी से खुद शैतान हो जैसे
क्या-क्या कर डाला कहू मै कैसे
सहमे न्यारे जो ख्वाब देखे
खुशियो से झिलमिलाते तारे
मुरझा चले है सारे
फिर एक दिन आयेगा ज़रूर
दूर करता रात अंधियारी
तब-तक धुन्धु मै
वो चिंगारी
मै वो इंसान को धुन्धु
खोई मुस्कान को धुन्धु
बस इक परछाइन हू
एक खामोश गहराई हू..
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