खता नही
मेरी कुछ खता नही
खामोश रह ना सका
ना जाने क्यो पता नही
अब मगर
ये पूरा हुआ है कहर
अपनी है शाम-ओ-सहर
भीगी है फिर क्यो नज़र
इन हवाओ मे पांव रख कर हम आज उड़ने लगे
हाथ ये जो उठे यहा कई खाब जुड़ने लगे
इन हवाओ मे पांव रख कर हम आज उड़ने लगे
हाथ ये जो उठे यहा कई खाब जुड़ने लगे
अंधेरो को चिर के आज रोशनी ये चली
अपनो ने गिरह खोल दी दुनिया लगे भली
खुशिया बरसती है यहा सब दुःख पुराने लगे
यू मुसकुराने की चाह मे कितने ज़माने लगे
सहमी हुई
मुरादे कई पहनी हुई
खोया है सारा जहा
कैसी ये बेरहमी हुई
जी गए
देखा तुझे तो हम जी गए
नज़रो से छू के तुझे
हज़ारो गम सी गए
जिस्म से आज रूह तक तुझमे समा जायेगे,
फासलो को मिटा के हम दुनिया बसा जायेगे..
अंधेरो को चिर के आज रोशनी ये चली,
अपनो ने गिरह खोल दी दुनिया लगे भली,
खुशिया बरसती है यहां सब दुःख पुराने लगे,
यू मुसकुराने की चाह मे कितने ज़माने लगे...
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