यारा हू मौला,यारा हू मौला
यादो मे है अब भी
क्या सुरीला वो जहा था
हमारे हाथो मे रंगीन गुबारे थे
और दिल मे मेहेकता समा था, यारा हू मौला
वो तो ख्वाबो की थी दुनिया, वो किताबो की थी दुनिया
सास मे थे मचलते हुए ज़ल्जले
आंख मे वो सुहाना नशा था, यारा हू मौला
वो ज़मीन थी, आसमान था,हम को लेकिन क्या पता था
हम खड़े थे जहा पर
उस्सी के किनारे पे गहरा सा अंधा कुआ था,
फिर वो आये भीड़ बन कर, हाथ मे थे उनके खान्झार
बोले फेंको ये किताबे, और संभालो यह सलाखे
जो गहरा सा कुआ है, अंधा तो नही है
इस कुए मे है खज़ाना, कल की दुनिया तो यही है
कूद जाओ लेके खान्झार , काट डालो जो हो अन्दर
तुम ही कल के हो शिवाजी, तुम ही कल के हो सिकंदर
हमने वो ही किया जो उहोने कहा, क्युंकी उनकी तो खवाहिश यही थी
हम नही जानते यह भी क्यो यह किया? क्युंकी उनकी फरमाइश यही थी
अब हमारे लगा जायका खून का,अब बताओ करे तो करे क्या
नही है कोई जो हमे कुछ बताये,बताओ करे तो करे क्या
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