भीगी हुई कोई शाम वो
मेहका हुवा कोई नाम वो
बिन बात ही होती है नीलाम वो
मशहूर है फिर भी बदनाम वो
जाने हुवा है आज क्या हमे न हम
जाने क्यू हम को याद आये वो
अब इस तरह उसको सोचता हू
गुज़रे हुवे वोह पल रोकता हू
वोह पल कही खो गए है जो अपने
और साथ भी हो गए है जो सपने
जाने हुवा है आज क्या हमे न हम
जाने क्यूं हम को याद आये वो
वो रौशनी वो आग है
या फिर कोई चराग है
जिससे धीरे धीरे है जलना
जिससे इस तरह ही है चलना
किसी मोड़ पे वो आज भी केंदील सी जलेगी
शहर की धुप सी बेवक्त ही धहेलेगी
क्यू हमको याद
भीगी हुवी कोई शाम वो
महका हुवा कोई नाम वो
बिन बात ही होती है नीलाम वो
मश-हूर है फिर भी बदनाम वो
जाने हुवा है आज क्या हमे न हम
जाने
क्यू हम को याद आये वो...
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